बड़ी खबर-डीएम ने दिया पत्रकारों को नववर्ष का नायाब तोहफा


देहरादून में एक डीएम, छह फैसले और लोकतंत्र की एक छोटी-सी राहत

देहरादून में एक बैठक हुई। कोई बहुत शोर नहीं था। न कोई मंच सजा था, न तालियां बजीं। लेकिन उस कमरे में लिए गए फैसलों की आवाज़ दूर तक जाएगी अगर वे काग़ज़ से निकलकर ज़मीन तक पहुँचे। देहरादून के जिलाधिकारी आईएएस सविन बंसल के सामने पत्रकार बैठे थे। वही पत्रकार, जो रोज़ कुर्सियों के सामने खड़े रहते हैं।
जो लाइन में लगते हैं, टोल पर रुकते हैं, अस्पतालों में इंतज़ार करते हैं और फिर भी सवाल पूछते हैं। इस बार सवाल पूछने वालों ने सवाल रखे। कुल छह माँगें। न बहुत बड़ी, न बहुत असंभव। बस इतनी कि काम करते समय थोड़ी गरिमा बची रहे।और हैरानी की बात यह रही कि जिलाधिकारी ने सिर्फ़ सुना नहीं मान लिया।
सूचना विभाग अब ज़िला और प्रदेश स्तर पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों के वाहनों को आधिकारिक प्रेस स्टीकर देगा। यह सिर्फ़ स्टीकर नहीं है। यह उस पहचान की बात है, जो कई बार सड़क पर, चेकपोस्ट पर और भीड़ में सवालों के साथ कुचली जाती है।
सरकारी अस्पतालों में अब पत्रकारों के लिए अलग ओपीडी और दवा वितरण की व्यवस्था होगी। यह सुविधा नहीं, यह समझ है कि जो दूसरों की पीड़ा लिखता है, उसे हर बार पीड़ा की कतार में खड़ा न किया जाए। सरकारी पार्किंग स्थलों पर पत्रकारों से अब शुल्क नहीं लिया जाएगा। खबर की तलाश में निकले व्यक्ति को पहले पार्किंग मीटर से जूझना पड़े यह व्यवस्था पर सवाल था। अब उस सवाल पर जवाब मिला है। नगर निगम और नगर पालिकाओं की वार्ड और मोहल्ला विकास समितियों में अब स्थानीय पत्रकारों को प्रतिनिधित्व मिलेगा।
यानी विकास की फ़ाइलों में अब वही लोग झाँकेंगे, जो रोज़ विकास की हक़ीक़त जनता को दिखाते हैं।
जनपद के भीतर स्थानीय स्तर पर पत्रकारों के वाहनों को टोल टैक्स से मुक्त रखने की प्रक्रिया पर काम होगा। क्योंकि खबर अक्सर शहर की सीमा पर नहीं रुकती। पत्रकारों के लिए लोकल परचेज (एलपी) के माध्यम से दवाइयों की सुविधा फिर से बहाल की जाएगी। यह निर्णय उन लोगों के लिए है, जो बीमारी में भी डेडलाइन देखते हैं। बैठक के बाद जिलाधिकारी सविन बंसल ने अधिकारियों को साफ़ कहा इन आदेशों को टालना नहीं है। लागू करना है। उन्होंने कहा पत्रकार समाज का आईना हैं। उनके काम को आसान बनाना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है। अब सवाल यही है कि क्या ये फैसले सिर्फ़ बैठक की कार्यवाही बनकर रहेंगे? या वाक़ई ज़मीन पर दिखेंगे? क्योंकि लोकतंत्र में फैसले तब मायने रखते हैं, जब वे खबर नहीं हक़ीक़त बनें।

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